
रिपोर्ट:मंटू यादव
पाकुड़ (अमड़ापाड़ा प्रखंड):
देश भले ही चांद तक पहुंच गया हो, लेकिन झारखंड के पाकुड़ जिले के अमड़ापाड़ा प्रखंड में आज भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव साफ दिखाई देता है। आज़ादी के 75 साल बीत जाने के बाद भी इस इलाके में सड़क जैसी मूलभूत सुविधा तक नहीं पहुंच सकी। इसका जीता-जागता उदाहरण उस वायरल तस्वीर में देखा जा सकता है, जिसमें ग्रामीण एक बीमार व्यक्ति को खटिया पर लादकर इलाज के लिए कंधे पर ढोते हुए ले जा रहे हैं।

यह दृश्य किसी 18वीं सदी के जंगल में बसे समुदाय का नहीं, बल्कि 21वीं सदी के डिजिटल इंडिया के उस राज्य का है, जहां सरकार “सबका साथ, सबका विकास” की बात करती है। लेकिन असल ज़मीनी हकीकत कुछ और ही है।
बीमार के लिए न सड़क, न एंबुलेंस
इलाके में सड़क नहीं होने के कारण आज भी लोगों को बारिश, कीचड़, और उबड़-खाबड़ रास्तों से होकर गुजरना पड़ता है। बीमार या गर्भवती महिलाओं को अस्पताल पहुंचाना किसी दुर्गम यात्रा से कम नहीं। एंबुलेंस या स्वास्थ्य सेवाओं की बात करना यहां कोरी कल्पना है।
सरकार के दावे खोखले साबित
हर साल बजट में सड़क, स्वास्थ्य और विकास के लिए करोड़ों रुपये की घोषणा होती है, लेकिन जमीन पर इसका कोई असर नहीं दिखता। यह तस्वीर ना सिर्फ स्थानीय प्रशासन की नींद तोड़ने वाली है, बल्कि सरकार की योजनाओं की विफलता की पोल भी खोलती है।
ग्रामीणों का आक्रोश
स्थानीय लोगों ने बताया कि कई बार अधिकारियों और नेताओं से सड़क की मांग की गई, लेकिन हर बार केवल आश्वासन ही मिला। ग्रामीणों का कहना है कि “हम वोट देने जाते हैं, लेकिन इलाज के लिए खटिया पर लादे जाते हैं। क्या यही है विकास?”
क्या अमडापाड़ा के लोग कभी विकास देख पाएंगे?
यह सवाल अब पूरे सिस्टम से है — क्या आदिवासी और दूरस्थ क्षेत्रों के लोग सिर्फ वोट बैंक बनकर रह जाएंगे? या फिर कभी उन्हें भी इंसानी जिंदगी जीने लायक बुनियादी सुविधाएं मिलेंगी?
👉 यह सिर्फ एक तस्वीर नहीं, एक सिस्टम पर तमाचा है।
👉 ये खटिया नहीं, एक कराहती व्यवस्था का आईना है।
👉 अब सवाल उठता है – आखिर कब तक?




