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मोतीलेदा में 1970 के दशक से लग रहा है ऐतिहासिक छाता मेला।

श्रद्धा, परंपरा और उत्सव का अद्भुत संगम।

मुकेश वर्मा /संवादाता NO1 NEWS JHAEKHAND BIHAR 

गिरिडीह जिले के बेंगाबाद प्रखंड अंतर्गत मोतीलेदा गांव में दशकों पुराना प्रसिद्ध “छाता मेला” आज भी अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को संजोए हुए है। यह मेला न सिर्फ एक धार्मिक आयोजन के रूप में जाना जाता है, बल्कि यह लोक परंपरा, आस्था और सामुदायिक एकता का प्रतीक भी बन चुका है। हर वर्ष विजयदशमी के बाद एकादशी के दिन यहां हजारों श्रद्धालु और दर्शक एकत्र होकर इस पारंपरिक मेले को भव्य रूप देते हैं।

बारिश में हुई पूजा से पड़ा “छाता मेला” नाम

मोतीलेदा छाता मेले की शुरुआत 1970 के दशक में हुई थी। बताया जाता है कि जिस दिन यहां मां दुर्गा की पूजा की शुरुआत की गई थी, उस दिन अचानक मौसम में बदलाव हुआ और तेज बारिश होने लगी। इसके बावजूद श्रद्धालुओं ने अपना उत्साह कम नहीं होने दिया। सभी लोग छाता लगाकर मां की आराधना और पूजा में शामिल हुए। बारिश के बीच छातों की कतारें और मां के प्रति गहरी श्रद्धा देखकर ग्रामीणों ने इस आयोजन को विशेष नाम देने का विचार किया। तभी से इस मेले को “छाता मेला” के नाम से जाना जाने लगा।

 

यह नाम धीरे-धीरे पूरे इलाके में प्रसिद्ध हो गया और आज छाता मेला न केवल गिरिडीह जिला, बल्कि आसपास के जिलों में भी प्रसिद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन के रूप में जाना जाता है।

एक महीने पहले से शुरू होती हैं तैयारियां

मोतीलेदा में छाता मेला के आयोजन की तैयारी पूजा से लगभग एक महीने पहले ही शुरू हो जाती है। स्थानीय पूजा समिति के सदस्य और ग्रामीण इस आयोजन को सफल बनाने के लिए सामूहिक रूप से जुट जाते हैं। सबसे पहले पूजा पंडाल और परिसर की सफाई, सजावट और रंग-रोगन का काम होता है। इसके बाद बिजली, प्रकाश व्यवस्था, जलापूर्ति और सुरक्षा संबंधी व्यवस्थाओं को दुरुस्त किया जाता है।

 

समिति के सदस्य विभिन्न टीमों में बंटकर अलग-अलग जिम्मेदारियां निभाते हैं। महिलाओं की टीम फूल-मालाओं, भोग की व्यवस्था और आरती की तैयारी में जुटती है तो युवा वर्ग मंच निर्माण, पंडाल की सजावट और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की रूपरेखा तय करने में लग जाता है। इस दौरान पूरे गांव में एक तरह का उत्सव और मेल-जोल का माहौल बन जाता है।

एकादशी को लगता है भव्य मेला

मोतीलेदा का छाता मेला विजयदशमी के बाद एकादशी के दिन आयोजित किया जाता है। इस दिन सुबह से ही दूर-दराज़ के इलाकों से श्रद्धालु और दर्शक यहां पहुंचने लगते हैं। लोग पारंपरिक वेशभूषा में, परिवार और दोस्तों के साथ मां दुर्गा के दर्शन और मेला घूमने आते हैं।

 

मेला स्थल पर तरह-तरह की दुकानों की लंबी कतारें लग जाती हैं—खिलौनों की दुकानें, मिठाई की दुकानें, झूले, कपड़े, आभूषण और घरेलू सामान। बच्चे झूलों का आनंद उठाते हैं तो महिलाएं खरीदारी में व्यस्त रहती हैं। स्थानीय व्यंजनों की सुगंध पूरे मेले में माहौल को और भी जीवंत बना देती है।

सांस्कृतिक कार्यक्रमों में झलकती है लोक संस्कृति।

छाता मेले का एक और बड़ा आकर्षण यहां आयोजित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम हैं। शाम होते ही मुख्य मंच पर स्थानीय कलाकारों और आमंत्रित मेहमानों द्वारा नृत्य, गीत, नाटक और लोक नृत्य की प्रस्तुतियां दी जाती हैं। झारखंड की पारंपरिक लोक संस्कृतियों—जैसे , खोरठा और भक्ति  की झलक इन कार्यक्रमों में बखूबी दिखाई देती है।

इन सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में सिर्फ मनोरंजन ही नहीं, बल्कि सामाजिक संदेश और लोक परंपराओं का संरक्षण भी झलकता है। यही वजह है कि इन कार्यक्रमों को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग देर रात तक डटे रहते हैं।

आस्था और एकता का प्रतीक बना यह मेला।

मोतीलेदा छाता मेला केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह सामुदायिक एकता, सहयोग और सामाजिक समरसता का प्रतीक बन चुका है। इस आयोजन में न केवल हिंदू धर्मावलंबी बल्कि अन्य धर्म और समुदायों के लोग भी बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं। सभी मिलकर इस पारंपरिक आयोजन को सफल बनाने में योगदान देते हैं।

इस मेले के दौरान श्रद्धालु मां दुर्गा से अपने परिवार की सुख-समृद्धि और जीवन में शांति की कामना करते हैं। मेले के दिनों में गांव और आसपास के इलाके में सुरक्षा व्यवस्था भी सख्त रखी जाती है ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो।

साल दर साल बढ़ रही है प्रसिद्धि।

शुरुआत में यह मेला एक छोटे ग्रामीण स्तर का आयोजन था, लेकिन पिछले कुछ दशकों में इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई है। आज यह मेला गिरिडीह के प्रसिद्ध धार्मिक मेलों में शुमार हो चुका है। प्रशासन भी इस आयोजन में हर संभव सहयोग प्रदान करता है।

स्थानीय लोग मानते हैं कि यह मेला न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी लाभदायक साबित होता है। मेला अवधि के दौरान आसपास के क्षेत्रों से आने वाले व्यापारियों और दुकानदारों को अच्छा कारोबार मिलता है, जिससे गांव की आर्थिक गतिविधियों में भी रौनक आ जाती है।

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